द्वितीय महाविद्या — संकटमोचिनी तारिणी
तोडल तंत्र व तारा तंत्र सम्मत प्रामाणिक नील सरस्वती अनुष्ठान। दारिद्र्य का समूल नाश, मेधा बुद्धि और जीवन उद्धार का अचूक मार्ग।
आचार्य जी से परामर्श लेंप्रत्यालीढपदां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्। खर्वां लम्बोदरीं भीमां व्याघ्रचर्मावृतां कटौ॥
नवयौवनसम्पन्नां पञ्चमुद्राविभूषिताम्। चतुर्भुजां लोलजिह्वां महाभीमां वरप्रदाम्॥
दश महाविद्याओं में द्वितीय स्थान भगवती माँ तारा का है। 'तारयति इति तारा' — अर्थात् जो अपने शरणागत साधक को संसार के समस्त दारिद्र्य, अज्ञान, भय, रोग और भवसागर के अथाह संकटों से तार देती हैं (पार लगा देती हैं), वे ही पराशक्ति माँ तारा हैं। तंत्र शास्त्र में माँ तारा को कालकूट विष का शमन करने वाली परम वात्सल्यमयी मातृ शक्ति माना गया है। भौतिक जीवन में जब व्यापार ठप हो जाए, ऋण का बोझ असहनीय हो जाए, बुद्धि कुंठित हो जाए अथवा जन्मकुंडली में देवगुरु बृहस्पति दूषित होकर जीवन में दरिद्रता और अपयश ला रहे हों, तब माँ तारा की आराधना कल्पवृक्ष सिद्ध होती है।
ज्योतिषीय दृष्टि से माँ तारा का आधिपत्य देवगुरु बृहस्पति (Jupiter) पर है। गुरु-चांडाल योग, नीच के गुरु अथवा धनु व मीन राशि के जातकों के लिए तारा साधना जीवन की दिशा और दशा बदलने वाली अलौकिक शक्ति है।
माँ तारा का स्वरूप बाह्य दृष्टि से माँ काली के सदृश प्रतीत होता है, किंतु तात्विक और आध्यात्मिक दृष्टि से इनमें अत्यंत सूक्ष्म और गहन अंतर है। माँ काली आकाश तत्व और संहार शक्ति की अधिष्ठात्री हैं, जबकि माँ तारा जल तत्व (जीवन रस) और भवसागर पार कराने वाली तारक शक्ति की स्वामिनी हैं। माँ तारा का वर्ण नीला (नील-मेघ वर्ण) है, जो अनंत ज्ञान, शांत चेतना और परा-चेतना का प्रतीक है।
देवी के चार हाथ हैं। ऊपरी बाएं हाथ में खड्ग (ज्ञान का शस्त्र) है जो अज्ञान को काटता है। निचले बाएं हाथ में कपाल या खप्पर है जिसमें वे ब्रह्मांडीय विष को धारण करती हैं। ऊपरी दाहिने हाथ में नीलोत्पल (नील कमल) है जो शुद्ध भक्ति, निर्मल बुद्धि और योग की पूर्णता का प्रतीक है। निचला दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है जो साधक को अभय, धन, सिद्धि और मोक्ष प्रदान करता है। देवी के मस्तक पर पिंगल जटाओं के मध्य अक्षोभ्य शिव नाग रूप में विराजमान हैं, जो यह दर्शाते हैं कि शांत चित्त और अचल समाधि ही तारा तत्व को प्राप्त करने का मार्ग है।
पौराणिक कथा व प्राकट्य: कालिका पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय हलाहल (कालकूट) विष निकला, तो संपूर्ण ब्रह्मांड जलने लगा। भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण किया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। किंतु कालकूट के तीव्र ताप से भगवान शिव की चेतना मूर्छित होने लगी। तब सम्पूर्ण देवताओं की प्रार्थना पर भगवती तारा प्रकट हुईं। उन्होंने एक स्नेहमयी माता की भांति भगवान शिव को अपनी गोद में लिया और उन्हें अमृतमय स्तनपान कराकर विष की तीव्र ज्वाला को शांत किया। इसीलिए माँ तारा को 'अक्षोभ्य जननी' कहा गया है।
माँ तारा के तीन प्रमुख स्वरूप:
१. उग्रतारा: समस्त दुखों, घोर संकटों और शत्रुओं का क्षण मात्र में संहार करने वाला प्रचंड रूप।
२. एकजटा: एकाग्र चित्त, योग सिद्धि और कुण्डलिनी जागरण का परम स्वरूप।
३. नील सरस्वती: साहित्य, काव्य, शास्त्रार्थ, अकादमिक मेधा, उच्च शिक्षा और वाक्-सिद्धि प्रदान करने वाली ज्ञान की अधिष्ठात्री।
वैदिक तंत्र और ज्योतिष के प्रामाणिक ग्रंथ तोडल तंत्र में वर्णित है—"गुरौ तारा प्रकीर्तिता"। नवग्रहों में ज्ञान, धर्म, संतान, धन और भाग्य के कारक देवगुरु बृहस्पति की स्वामी महाविद्या माँ तारा हैं।
माँ तारा की साधना को शास्त्रों में "अकाल विपत्ति नाशिनी" कहा गया है। इनकी विधिवत उपासना से साधक को निम्नलिखित चमत्कारी परिणाम प्राप्त होते हैं:
माँ तारा की साधना में मंत्रों के शुद्ध उच्चारण और सात्त्विक नियमों का अत्यधिक महत्व है।
॥ स्त्रीं ॥ (Streeng)
यह माँ तारा का एकाक्षरी संपुट बीज है। इसमें 'स' वर्ण संकटहरण का, 'त' वर्ण तारक शक्ति का, 'र' वर्ण मुक्ति का और ईकार महामाया की कृपा का सूचक है।
॥ ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् ॥
यह मंत्र तारा तंत्र का हृदय माना गया है। समस्त विपत्तियों का नाश करने और तीव्र धन-ज्ञान प्राप्ति के लिए यह अमोघ है।
॥ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः अस्य श्रीनीलसरस्वती मन्त्रस्य... ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं नीलसरस्वत्यै नमः ॥
॥ ॐ तारायै च विद्महे महोग्रायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
माँ तारा का यंत्र चेतना के सर्वोच्च स्तर को जाग्रत करने वाला ज्यामितीय मंडल है। तारा यंत्र के केंद्र में बिंदु, उसके चारों ओर त्रिकोण (सृष्टि, स्थिति, संहार), षट्कोण (ज्ञान और वैराग्य), अष्टदल कमल (अष्ट सिद्धियां) तथा बाहर तीन वृत्त और भूपुर होते हैं।
भारत में माँ तारा के विश्व विख्यात सिद्ध पीठ हैं जहाँ तंत्र साधना और दर्शन से तुरंत सिद्धि प्राप्त होती है:
स्थान व महत्व: द्वारका नदी के तट पर स्थित तारापीठ 51 शक्तिपीठों में अत्यंत प्रमुख है। यहाँ माँ सती के नेत्र (नयन) गिरे थे। यह महासिद्ध संत बामाखेपा (साधक बामा) की परम तपोभूमि है।
साधना महत्व: यहाँ का महाश्मशान तंत्र साधना के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। यहाँ माँ तारा अपने बाल रूप में भगवान शिव को स्तनपान कराती हुई दर्शन देती हैं।
स्थान व महत्व: गुवाहाटी के लतसिल क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन शक्तिपीठ है। माना जाता है कि यहाँ माँ सती की नाभि गिरी थी। कामाख्या पीठ के समीप यह अत्यंत जाग्रत तीर्थ है।
साधना महत्व: यहाँ माँ उग्रतारा की पूजा बिना किसी मूर्ति के एक जल-कुण्ड के रूप में की जाती है। यहाँ दर्शन करने से घोर शत्रु बाधा और दरिद्रता का नाश होता है।
स्थान व महत्व: ऋषिकुल्या नदी के पावन तट पर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह आदि शक्तिपीठ है। यहाँ माँ सती के दोनों स्तन गिरे थे।
साधना महत्व: यहाँ तारा और तारिणी दोनों बहनों की दिव्य पाषाण प्रतिमाएं पूजित हैं। संतान प्राप्ति और आरोग्य के लिए यहाँ दूर-दूर से भक्त आते हैं।
तोडल तंत्र के अनुसार 'गुरौ तारा प्रकीर्तिता' अर्थात् देवगुरु बृहस्पति की अधिष्ठात्री महाविद्या माँ तारा हैं। कुंडली में गुरु के नीच राशि (मकर) में होने, राहु के साथ गुरु-चांडाल योग बनने अथवा षष्ठ/अष्टम/द्वादश भाव में गुरु के पीड़ित होने पर माँ तारा की सात्त्विक आराधना से गुरु ग्रह के शुभ प्रभाव जाग्रत होते हैं तथा ज्ञान, सम्मान और समृद्धि प्राप्त होती है।
माँ तारा के मुख्य तीन रूप हैं—उग्रतारा, एकजटा और नील सरस्वती। गृहस्थ साधकों, विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों के लिए माँ 'नील सरस्वती' का स्वरूप परम कल्याणकारी है, जो सौम्य भाव से वाणी, बुद्धि, विवेक और अकादमिक सफलता प्रदान करता है।
माँ तारा का मूल बीज मंत्र 'स्त्रीं' (Streeng) है। विस्तृत तांत्रिक व वैदिक साधना हेतु सिद्ध मंत्र 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्' अथवा 'ॐ तारायै नमः' का जप किया जाता है। रुद्राक्ष अथवा स्फटिक माला पर नित्य 11 माला अथवा 1,25,000 जप का संकल्प लेकर 21 या 41 दिनों में अनुष्ठान पूर्ण किया जाता है।
तारा यंत्र को गुरुवार, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी अथवा चैत्र शुक्ल नवमी (तारा जयंती) के शुभ मुहूर्त में पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में स्थापित किया जाता है। यंत्र पर पंचामृत स्नान कराकर नीले पुष्प (अपराजिता) और श्वेत चंदन अर्पित कर घी का दीपक प्रज्वलित करें।
महर्षि वशिष्ठ जी की परंपरा के अनुसार तारा साधना अत्यंत संवेदनशील और तीव्र फलदायी है। बीज मंत्रों का सस्वर उच्चारण और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए योग्य गुरु से दीक्षा व रक्षा कवच प्राप्त करना अनिवार्य है। बिना गुरु मार्गदर्शन के उग्र प्रयोग नहीं करने चाहिए।
28+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र अनुभव। AIFAS एवं AICAS गोल्ड मेडलिस्ट। द्वितीय महाविद्या माँ तारा साधना, देवगुरु बृहस्पति शांति एवं गुरु-चांडाल दोष निवारण में विशेष दक्षता। तारा तंत्र एवं मुण्डमाला तंत्र के शास्त्रीय विधान के अनुसार देश-विदेश के साधकों का सुरक्षित मार्गदर्शन।
पंडित जी के बारे में अधिक जानेंकुंडली के अनुसार सटीक इष्ट महाविद्या निर्धारण, प्राण प्रतिष्ठित तारा यंत्र एवं प्रामाणिक वैदिक संकल्प विधि प्राप्त करें।