षष्ठ महाविद्या — प्रचंड चंडिका
तोडल तंत्र व छिन्नमस्ता तंत्र सम्मत प्रामाणिक वैदिक साधना। कालसर्प दोष मुक्ति, राजनीति में प्रचंड विजय और परम आत्मज्ञान का विधान।
आचार्य जी से परामर्श लेंप्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कर्त्तृकां दिग्वस्त्रां स्वकबन्धशोणितसुधाधारां पिबन्तीं मुदा।
प्रसार्य सखिद्वयं च परितो डाकिन्यसौ वर्णिनी तन्मध्ये विलसन्मुखं त्रिनयनं ध्यायेज्जपाकुङ्कुमम्॥
दश महाविद्याओं में षष्ठ स्थान परम उग्र और परम गूढ़ शक्ति भगवती माँ छिन्नमस्ता (प्रचंड चंडिका) का है। छिन्नमस्ता का स्वरूप बाह्य दृष्टि से अत्यंत विस्मयकारी और भयावह प्रतीत होता है, किंतु तंत्र और योग शास्त्र के अनुसार यह परम आत्म-बलिदान, अहंकार विसर्जन और कुंडलिनी योग के सहस्रार भेदन का सर्वोच्च प्रतीक है। जो साधक अपने संकुचित अहम् और काम-वासनाओं को काटकर परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है, उसके लिए माँ छिन्नमस्ता मोक्षदायिनी सिद्ध होती हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से माँ छिन्नमस्ता का सीधा आधिपत्य छाया ग्रह राहु (Rahu) पर है। जब जन्मकुंडली में राहु की महादशा, अंतर्दशा अथवा कालसर्प योग के कारण जीवन में अचानक अनिष्ट, मतिभ्रम, नशा, बदनामी, व्यापारिक विनाश और शत्रु षड्यंत्र हावी हो जाते हैं, तब माँ छिन्नमस्ता की सात्त्विक शरणागति जातक को जीवनदान देती है और राहु के विष को राजयोग में परिवर्तित कर देती है।
माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप तंत्र शास्त्र की सर्वाधिक रहस्यमयी अभिव्यक्ति है। ध्यान श्लोक के अनुसार देवी ने अपने दाहिने हाथ में तीक्ष्ण खड्ग (कर्तरी) धारण कर रखा है, जिससे उन्होंने स्वयं अपना मस्तक काटकर अपने बाएं हाथ में धारण किया हुआ है। उनके कंठ के कबंध से रक्त की तीन अमृत धाराएं वेगपूर्वक प्रवाहित हो रही हैं। मध्य धारा स्वयं देवी का कटा हुआ मुख आनंदपूर्वक पान कर रहा है, जबकि बाईं और दाईं ओर की दो धाराएं उनकी दो योगिनी सहचरियों—डाकिनी और वर्णिनी—द्वारा पी जा रही हैं। देवी एक खिले हुए श्वेत कमल पर कामदेव और रति के ऊपर प्रत्यालीढ़ मुद्रा में विराजमान हैं।
गूढ़ यौगिक रहस्य: यह दृश्य संसारी मनुष्यों को संहारकारी प्रतीत हो सकता है, परंतु योगियों के लिए यह कुण्डलिनी जागरण का गूढ़ विज्ञान है:
पौराणिक उत्पत्ति: प्रणतोषिणी तंत्र के अनुसार एक बार भगवती भवानी अपनी सहचरियों (जया और विजया / डाकिनी और वर्णिनी) के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान कर रही थीं। स्नान के उपरांत दोनों सहचरियों को तीव्र भूख लगी। उनका शरीर भूख से काला पड़ने लगा। उन्होंने माँ से भोजन मांगा। दयामयी माँ ने कुछ देर प्रतीक्षा करने को कहा, किंतु उनकी भूख इतनी बढ़ गई कि उन्होंने कहा—"हे माता! संतान की भूख तो माता ही शांत करती है।" तब करुणामयी माँ ने बिना क्षण भर गंवाए अपने ही खड्ग से अपना शीश काट दिया और अपने रक्त की धाराओं से अपनी संतानों की क्षुधा शांत की। इस परम मातृत्व और आत्म-बलिदान के कारण वे 'छिन्नमस्ता' कहलाईं।
वैदिक तंत्र के प्रामाणिक ग्रंथ तोडल तंत्र के दसवें पटल में वर्णित है कि नवग्रहों में सबसे रहस्यमयी और क्रूर छाया ग्रह राहु (Rahu) की अधिष्ठात्री महाविद्या माँ छिन्नमस्ता हैं।
माँ छिन्नमस्ता की विधिवत सात्त्विक साधना से साधक को निम्नलिखित चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
माँ छिन्नमस्ता की साधना तंत्र शास्त्र में अत्यंत गोपनीय मानी गई है। गृहस्थ साधकों को केवल गुरु के सानिध्य में सात्त्विक मंत्र का ही आश्रय लेना चाहिए।
॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूँ हूँ फट् स्वाहा ॥
यह छिन्नमस्ता का सर्व-प्रसिद्ध सिद्ध महामंत्र है। इसमें लक्ष्मी (श्रीं), माया (ह्रीं), काम (क्लीं) और सरस्वती (ऐं) चारों बीजों का समन्वय है। यह साधक की समस्त दारिद्रता और शत्रुओं का संहार करता है।
॥ ॐ ह्रीं क्लीं ऐं छिन्नमस्तायै नमः ॥
॥ ॐ वैरोचन्यै विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
छिन्नमस्ता यंत्र परम शक्तिशाली और गोपनीय ज्यामितीय चक्र है। इसमें केंद्र में योनि रूपी त्रिकोण, उसके बाहर षट्कोण (दो अंतर्ग्रथित त्रिकोण), अष्टदल कमल, तीन वृत्त और बाह्य चतुर्द्वार भूपुर होता है।
भारत में माँ छिन्नमस्ता के अत्यंत जाग्रत और अलौकिक सिद्ध पीठ हैं जहाँ दर्शन मात्र से राहु के समस्त कष्ट कट जाते हैं:
स्थान व महत्व: रामगढ़ जिले में दामोदर और भेड़ा (भैरवी) नदी के संगम पर स्थित यह विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। असम के कामाख्या मंदिर के बाद यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा तांत्रिक शक्तिपीठ माना जाता है।
साधना महत्व: यहाँ माँ छिन्नमस्ता का दिव्य स्वयंभू पाषाण विग्रह विराजमान है। यहाँ कालसर्प दोष, राहु शांति और असाध्य संकटों के निवारण हेतु देश-विदेश से तांत्रिक और गृहस्थ आते हैं।
स्थान व महत्व: शिवालिक पर्वतमाला में स्थित यह पावन 51 शक्तिपीठों में एक है। यहाँ माँ सती के पैर का भाग गिरा था। इन्हें 'छिन्नमस्तिका' और 'चिंतपूर्णी' (चिंता हरने वाली) कहा जाता है।
साधना महत्व: यहाँ भक्त अपनी समस्त चिंताएं माँ के चरणों में समर्पित कर पूर्ण निश्चिंत हो जाते हैं। यहाँ का वातावरण अत्यंत सात्त्विक और शांतिप्रद है।
स्थान व महत्व: नीलांचल पर्वत पर कामाख्या मंदिर परिसर में षष्ठ महाविद्या छिन्नमस्ता का अत्यंत जाग्रत मंदिर है।
साधना महत्व: यहाँ तांत्रिक साधक उच्च कोटि की कुंडलिनी साधना और राहु दोष शांति के लिए गुप्त अनुष्ठान करते हैं।
तोडल तंत्र के अनुसार छाया ग्रह राहु की अधिष्ठात्री महाविद्या माँ छिन्नमस्ता हैं। राहु सिर का कारक है और छिन्नमस्ता स्वरूप में देवी ने स्वयं अपने शीश को पृथक किया है, जो राहु के अहंकार और भ्रम के विच्छेदन का प्रतीक है। जब कुंडली में राहु की महादशा, अंतर्दशा अथवा कालसर्प योग के कारण जीवन में अचानक अनिष्ट, मानसिक मतिभ्रम, षड्यंत्र और आर्थिक पतन हो रहा हो, तब माँ छिन्नमस्ता की विधिवत सात्त्विक साधना से राहु का विष अमृत में परिवर्तित हो जाता है और जातक को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त होती है।
बाहरी दृष्टि से उग्र दिखने वाला यह स्वरूप योग शास्त्र का सर्वोच्च रहस्य है। देवी का कटा हुआ मस्तक संकुचित अहंकार (Ego) के विसर्जन का प्रतीक है। कंठ से निकलने वाली तीन रक्त धाराएं शरीर की तीन मुख्य नाड़ियों—इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना—का प्रतिनिधित्व करती हैं। दोनों सखियां डाकिनी और वर्णिनी इड़ा और पिंगला हैं, जबकि मध्य धारा सुषुम्ना नाड़ी है जो सीधे सहस्रार चक्र में अमृत रस का पान कराती है। यह दृश्य काम-वासना पर विजय और कुंडलिनी के पूर्ण जागरण का प्रतीक है।
माँ छिन्नमस्ता का परम सिद्ध महामंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूँ हूँ फट् स्वाहा' है। इसके अतिरिक्त सौम्य मानसिक जप हेतु 'ॐ ह्रीं क्लीं ऐं छिन्नमस्तायै नमः' का जप किया जाता है। रुद्राक्ष अथवा काले हकीक की माला पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके नित्य 11 माला अथवा 1.25 लाख जप का संकल्प लेकर 21 या 41 दिनों में अनुष्ठान पूर्ण किया जाता है।
छिन्नमस्ता यंत्र की स्थापना शनिवार, अमावस्या, नवरात्रि अथवा वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (छिन्नमस्ता जयंती) के पावन दिन निशीथ काल (मध्य रात्रि) अथवा ब्रह्म मुहूर्त में उत्तर दिशा में करनी चाहिए। ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित यंत्र पर रक्त चंदन, सिन्दूर और लाल गुड़हल अर्पित करें।
कदापि नहीं। माँ छिन्नमस्ता दश महाविद्याओं में अत्यंत जाग्रत और उग्र शक्ति हैं। बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन, रक्षा कवच और संकल्प के इनकी तांत्रिक साधना करना अत्यंत वर्जित है। गृहस्थ साधक गुरु की अनुमति से केवल सात्त्विक ध्यान, नाम मंत्र अथवा छिन्नमस्ता स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं, जिससे राहु दोष का शमन और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
28+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र अनुभव। AIFAS एवं AICAS गोल्ड मेडलिस्ट। षष्ठ महाविद्या माँ छिन्नमस्ता साधना, राहु महादशा शांति, कालसर्प दोष निवारण एवं शत्रु स्तंभन अनुष्ठान में विशेषज्ञ। तोडल तंत्र एवं छिन्नमस्ता तंत्र के प्रामाणिक शास्त्रीय विधान के अनुसार देश-विदेश के साधकों को सात्त्विक व सुरक्षित मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
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