चतुर्थ महाविद्या — त्रिभुवन साम्राज्ञी
देवी भागवत व तोडल तंत्र सम्मत प्रामाणिक वैदिक साधना। अवसाद व मानसिक अशांति से मुक्ति, राजयोग और अचल संपत्ति का वरदान।
आचार्य जी से परामर्श लेंउद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्। स्मितमुखीं वरदामङ्कुशपाशाभीतिकराम् प्रभजे भुवनेशीम्॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्ततारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्॥
दश महाविद्याओं में चतुर्थ स्थान संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री भगवती माँ भुवनेश्वरी का है। 'भुवन' का अर्थ है चौदह लोक (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक आदि) और 'ईश्वरी' का अर्थ है उनकी स्वामिनी। माँ भुवनेश्वरी वह मूल आद्याशक्ति हैं जिनके संकल्प मात्र से सृष्टि का विस्तार होता है। तंत्र शास्त्र में माँ भुवनेश्वरी को 'विश्वमाता' और 'राजराजेश्वरी' की जननी माना गया है।
ज्योतिषीय दृष्टि से माँ भुवनेश्वरी का सीधा आधिपत्य चंद्र ग्रह (Moon) पर है। वैदिक ज्योतिष का सिद्धांत है—"चन्द्रमा मनसो जातः"। मानव जीवन में मानसिक सुख, पारिवारिक शांति, माता का स्वास्थ्य, भूमि, भवन, नया घर और वाहन का सुख सीधे चंद्रमा और कुंडली के चतुर्थ भाव से नियंत्रित होता है। जब चंद्रमा राहु, केतु या शनि से पीड़ित होकर अवसाद या आर्थिक असुरक्षा देता है, तब माँ भुवनेश्वरी की सात्त्विक साधना अमृत बनकर जीवन को प्रफुल्लित कर देती है।
माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप अत्यंत दिव्य, मनोरम, सौम्य और राजसी है। इनका वर्ण उगते हुए प्रातःकालीन बाल सूर्य के समान अरुण (रक्त-स्वर्ण आभा) है। देवी के मस्तक पर रत्नजड़ित स्वर्णिम मुकुट पर दूज का अर्धचंद्र शोभायमान है, जो शीतलता और शांति का प्रतीक है। उनके तीन नयन भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों पर दृष्टि रखते हैं। उनके मुखमण्डल पर सदैव एक मंद और स्नेहमयी मुस्कान खिली रहती है, जो साधक के अंतर्मन के समस्त संतापों को क्षण भर में हर लेती है।
देवी के चार कर-कमल हैं: ऊपरी दाहिने हाथ में अंकुश है जो साधक के मन की चंचलता, अहंकार और अनियंत्रित वासनाओं को नियंत्रित करता है। ऊपरी बाएं हाथ में पाश है जो साधक के भीतर सात्त्विक प्रेम, आकर्षण और ईश्वरीय अनुराग बांधता है। निचला दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है जो संसार के समस्त भयों और चिंताओं से मुक्ति दिलाता है, तथा निचला बायां हाथ वरद मुद्रा में है जो भूमि, भवन, धन, ऐश्वर्य और संपूर्ण सांसारिक कामनाओं की पूर्ति करता है।
पौराणिक प्राकट्य व मणिद्वीप का रहस्य: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार सृष्टि के सृजन से पूर्व केवल महाप्रलय और घोर अंधकार था। तब निराकार परब्रह्म के हृदय में सृष्टि विस्तार की इच्छा जाग्रत हुई। उसी समय भगवती भुवनेश्वरी का प्राकट्य हुआ। देवी ने अपने तेज से अंधकार को विदीर्ण कर चौदह भुवनों की रचना की।
देवीभागवत के बारहवें स्कंध में मणिद्वीप का विस्तृत आख्यान है। सर्वलोक से ऊपर स्थित मणिद्वीप ही भगवती भुवनेश्वरी का दिव्य धाम है, जहाँ चिंतामणि गृह में देवी एक रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं। ब्रह्मा जी सृष्टि के सृजन, भगवान विष्णु स्थिति (पालन) और भगवान शिव संहार की आज्ञा माँ भुवनेश्वरी के चरणों में शीश झुकाकर ही प्राप्त करते हैं।
वैदिक तंत्र ग्रंथ तोडल तंत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि नवग्रहों में चंद्रमा की अधिष्ठात्री महाविद्या माँ भुवनेश्वरी हैं।
माँ भुवनेश्वरी की साधना गृहस्थ साधकों के लिए वरदान मानी गई है। इनकी नित्य उपासना से साधक को निम्नलिखित विशिष्ट फल प्राप्त होते हैं:
माँ भुवनेश्वरी की साधना अत्यंत सौम्य और प्रेममयी होती है। इसे पूर्ण पवित्रता और सात्त्विक नियमों के साथ किया जाना चाहिए।
॥ ह्रीं ॥ (Hreeng)
यह माँ भुवनेश्वरी का साक्षात् हृदय और तांत्रिक 'माया बीज' है। इसमें 'ह' शिव है, 'र' प्रकृति है, 'ई' महामाया है और बिंदु सर्वदुःख विदारक नाद है। इस बीज के उच्चारण मात्र से समस्त पाप धुल जाते हैं।
॥ ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः ॥
॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौः भुवनेश्वर्यै नमः ॥
॥ ॐ नारायण्यै विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
भुवनेश्वरी यंत्र संपूर्ण ब्रह्मांड का लघु रूप माना जाता है। इस यंत्र में केंद्र बिंदु, उसके चारों ओर षट्कोण (दो अंतर्ग्रथित त्रिकोण), अष्टदल कमल, तीन वृत्त और चार द्वारों वाला भूपुर होता है। इस यंत्र की घर में स्थापना से वास्तु दोषों का स्वतः शमन हो जाता है।
भारतवर्ष में माँ भुवनेश्वरी के कई प्राचीन और चमत्कारी तीर्थ स्थल हैं जहाँ भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं:
स्थान व महत्व: गुवाहाटी स्थित नीलांचल पर्वत की सर्वोच्च चोटी पर माँ भुवनेश्वरी का दिव्य मंदिर स्थित है। यह मुख्य कामाख्या मंदिर से कुछ ऊंचाई पर है।
साधना महत्व: यहाँ से सम्पूर्ण गुवाहाटी और ब्रह्मपुत्र नदी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। सूर्यास्त के समय यहाँ की गई साधना असीम मानसिक शांति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्रदान करती है।
स्थान व महत्व: जमशेदपुर के टेल्को में एक पहाड़ी (भुवनेश्वरी पहाड़ी) पर स्थित यह अत्यंत जाग्रत और भव्य मंदिर है। इसकी स्थापना स्वामी रंगा राजन जी द्वारा दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली में की गई थी।
साधना महत्व: यहाँ माँ भुवनेश्वरी के साथ-साथ श्री चक्र की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई है। यहाँ दर्शन करने से भूमि-भवन के विवाद दूर होते हैं।
स्थान व महत्व: हिमालय की शांत पर्वत श्रृंखलाओं में चंद्रकूट पर्वत पर स्थित सिद्ध पीठ। माना जाता है कि यहाँ माँ सती का धड़ गिरा था।
साधना महत्व: यहाँ माँ भुवनेश्वरी को चंद्रबदनी के रूप में पूजा जाता है। यह स्थल चंद्र ग्रह दोषों के निवारण हेतु अत्यंत पवित्र माना जाता है।
वैदिक तंत्र ग्रंथ तोडल तंत्र के अनुसार चंद्र ग्रह की अधिष्ठात्री शक्ति माँ भुवनेश्वरी हैं। चंद्रमा मन और भावनाओं का स्वामी है। जब कुंडली में चंद्र-शनि विष योग, केमद्रुम योग अथवा ग्रहण योग बनता है, तो व्यक्ति घोर डिप्रेशन और अनिद्रा से घिर जाता है। माँ भुवनेश्वरी के 'ह्रीं' बीज मंत्र की सात्त्विक साधना से मन को असीम शांति, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
माँ भुवनेश्वरी संपूर्ण ब्रह्मांड के चौदह भुवनों की स्वामिनी और अधिष्ठात्री हैं। जन्मकुंडली में भूमि, अचल संपत्ति और वाहन का कारक चतुर्थ भाव होता है। देवी भुवनेश्वरी की कृपा से जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद समाप्त होते हैं, नया मकान बनाने में आ रही अड़चनें दूर होती हैं और स्थायी ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
माँ भुवनेश्वरी का परम सिद्ध एकाक्षरी बीज मंत्र 'ह्रीं' (Hreeng) है, जिसे तंत्र में माया बीज या शक्ति बीज कहा जाता है। इसके अतिरिक्त संपूर्ण मंत्र 'ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः' अथवा 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौः भुवनेश्वर्यै नमः' का जप किया जाता है। स्फटिक या कमलगट्टे की माला पर शुक्ल पक्ष के सोमवार से नित्य 11 माला जप का विधान है।
भुवनेश्वरी यंत्र की स्थापना सोमवार, पूर्णिमा, अक्षय तृतीया अथवा नवरात्रि में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए। तांबे या चांदी पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित यंत्र पर गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक कर श्वेत चंदन और लाल गुलाब या कमल के पुष्प अर्पित करें।
हाँ, दश महाविद्याओं में माँ भुवनेश्वरी अत्यंत सौम्य, मातृत्वमयी और राजसी देवी हैं। इनकी साधना में किसी प्रकार का भय या उग्रता नहीं होती। गृहस्थ साधक अपने घर के पूजा स्थल पर श्वेत वस्त्र धारण कर, सात्त्विक भाव से इनका पूजन करके समस्त भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्राप्त कर सकते हैं।
28+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र अनुभव। AIFAS एवं AICAS गोल्ड मेडलिस्ट। चतुर्थ महाविद्या माँ भुवनेश्वरी साधना, चंद्र ग्रह शांति, मानसिक अवसाद निवारण एवं भूमि-भवन योग निर्माण में विशेषज्ञ। तोडल तंत्र एवं देवी भागवत के प्रामाणिक सूत्रों के आधार पर देश-विदेश के साधकों को सात्त्विक व सुरक्षित मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
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