नवम महाविद्या साधना
तांत्रिक सरस्वती, 64 कलाओं की अधिष्ठात्री, दिव्य आकर्षण और तेजस्वी व्यक्तित्व प्रदान करने वाली पराशक्ति।
आचार्य जी से परामर्श लेंश्यामांगीं शशिशेखरां त्रिनयनां वेणीं लसद्भूषितां, वीणां चामरकं तथा नरशिरः खेटं दधानां करैः। मातंगीं मदविह्वलां शुकयुतां लीलां वहन्तीं परां, सिन्दूरारुणकान्तिभूषणगणैर्दीप्तां भजे चण्डिकाम्॥ — मातंगी तन्त्र एवं रुद्रयामल
दश महाविद्याओं में नवम स्थान पर विराजमान माँ मातंगी को तंत्र शास्त्र में वाणी, विचार, ज्ञान, कला, संगीत और अभिव्यक्ति की सर्वोच्च स्वामिनी माना गया है। जहाँ वैदिक धारा में ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती हैं, वहीं तंत्र के गहन आध्यात्मिक धरातल पर माँ मातंगी को साक्षात 'तांत्रिक सरस्वती' और 'राज मातंगी' के रूप में पूजा जाता है। यह वह अद्वितीय शक्ति हैं जो साधक की सुप्त वाक-शक्ति को जाग्रत कर उसे ऐसी सम्मोहनकारी वाणी और ज्ञान का वरदान देती हैं कि उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द जनमानस के हृदय को स्पर्श कर लेता है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, माँ मातंगी का आधिपत्य नवग्रहों के राजा सूर्य देव (Sun) पर है और इनकी सूक्ष्म रश्मियां बुद्धि व वाणी के स्वामी बुध ग्रह (Mercury) को परिष्कृत करती हैं। जब जन्मकुंडली में सूर्य नीच राशि (तुला) में बैठकर मान-सम्मान की हानि करा रहा हो, सूर्य-राहु का ग्रहण दोष लगा हो, पितृ दोष के कारण वंश वृद्धि या पदोन्नति में अवरोध आ रहे हों, अथवा वाणी दोष (हकलाहट, आत्मविश्वास का अभाव) जीवन में बाधक बन रहा हो, तब माँ मातंगी की साधना साधक को सूर्य के समान प्रतापी और ओजस्वी बना देती है।
मातंगी तन्त्र, श्रीविद्यार्णव तन्त्र और मार्कण्डेय पुराण में वर्णित माँ मातंगी का स्वरूप अत्यंत मनोहारी, गरिमामयी और दिव्य आकर्षण से परिपूर्ण है। भगवती का वर्ण मरकत मणि (पन्ना) के समान हरित-श्याम (Dark Emerald Green) है। उनके तीन नेत्र हैं जो भूत, वर्तमान और भविष्य के साक्षी हैं। उनके मस्तक पर बालचंद्र का मुकुट सुशोभित है। माँ मातंगी चतुर्भुजा हैं—दो हाथों से वे दिव्य स्वर्णिम वीणा का वादन कर संपूर्ण ब्रह्मांड में नाद-ब्रह्म की मधुर झंकार उत्पन्न कर रही हैं। अन्य दो हाथों में वे खडग (अज्ञान को काटने वाली तलवार), कपाल (अहंकार को भस्म करने वाला पात्र) अथवा अंकुश-पाश धारण करती हैं। उनके कंधे या हाथ के समीप एक हरा तोता (शुक) बैठा रहता है, जो वाणी की मधुरता, शास्त्रार्थ और वेदों के उच्चारण का प्रतीक है।
नाद-ब्रह्म और वीणा का आध्यात्मिक रहस्य: तंत्र में ध्वनि (शब्द) को सृष्टि की प्रथम उत्पत्ति माना गया है—'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति'। माँ मातंगी साधक की नाभि से उठने वाली परा वाणी, हृदय में बनने वाली पश्यंती वाणी, कंठ तक आने वाली मध्यमा वाणी और जिह्वा से निकलने वाली वैखरी वाणी को दिव्य अमृत से भर देती हैं। जो साधक इनकी साधना करता है, उसकी वाणी में ऐसा ओज आ जाता है कि लोग उसके वचनों को आज्ञा के समान शिरोधार्य करते हैं।
पौराणिक प्राकट्य की कथा: महाभागवत पुराण के अनुसार, महर्षि मातंग ने समस्त प्राणियों को अपने वश में करने और ज्ञान की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या की थी। उनके कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवती शिवा उनके आश्रम में उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं, जिसके कारण वे 'मातंगी' कहलाईं।
'उच्छिष्ट चांडालिनी' स्वरूप का परम गूढ़ रहस्य: तंत्र ग्रंथों में माँ मातंगी को 'उच्छिष्ट चांडालिनी' भी कहा गया है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार, एक बार भगवान शिव और पार्वती भोजन कर रहे थे। भोजन के दौरान कुछ दिव्य अन्न कण भूमि पर गिर पड़े। उस उच्छिष्ट (अमृतोपम भोजन अवशेष) से एक अत्यंत तेजोमयी, श्याम वर्ण वाली कन्या का प्राकट्य हुआ। उसने भगवान शिव और पार्वती से प्रार्थना की कि उसे सेवा का अवसर दिया जाए। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा—'तुम मेरे उच्छिष्ट से प्रकट हुई हो, अतः जो साधक सामाजिक रूढ़ियों, बाह्य छुआछूत और दंभ से ऊपर उठकर निष्कपट हृदय से तुम्हारा ध्यान करेगा, तुम उसे समस्त कलाओं और विद्याओं का स्वामी बना दोगी।' यह कथा यह दर्शाती है कि ईश्वर के दरबार में कोई भी बाह्य पदार्थ अशुद्ध नहीं है; अशुद्ध केवल मनुष्य का मलिन मन और संकीर्ण विचार हैं। जब साधक का मन शुद्ध हो जाता है, तो साक्षात परम ब्रह्म ही प्रकट हो जाता है।
वैदिक ज्योतिष में आत्मा, जीवन शक्ति, राजकीय सत्ता, पिता और सम्मान का कारक ग्रह सूर्य (Sun) है। माँ मातंगी सूर्य ग्रह की अधिष्ठात्री महाशक्ति हैं:
माँ मातंगी की साधना लौकिक और पारलौकिक दोनों क्षेत्रों में अद्भुत वरदान प्रदान करती है। इस साधना के प्रमुख फल निम्नलिखित हैं:
माँ मातंगी का मंत्र अत्यंत मधुर, तेजस्वी और शीघ्र फलदायी माना गया है। शास्त्रोक्त प्रामाणिक मंत्र निम्नलिखित हैं:
१. एकाक्षरी मूल बीज मंत्र:
॥ ऐं ॥ अथवा ॥ ह्रीं ॥
२. राज मातंगी मंत्र (वाक सिद्धि व ऐश्वर्य हेतु):
॥ ॐ ह्रीं ऐं भगवति मतंगेश्वरि श्रीं मन्मातंग्यै नमः ॥
३. उच्छिष्ट मातंगी महामंत्र:
॥ ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ॥
मातंगी यंत्र नाद-ब्रह्म और 64 कलाओं की ज्यामितीय अभिव्यक्ति है। इस यंत्र की स्थापना अध्ययन कक्ष, संगीत साधना कक्ष अथवा पूजा घर में करने से वातावरण में असीम शांति और ज्ञान का संचार होता है।
भारत में माँ मातंगी के कई प्राचीन और जाग्रत पीठ हैं जहां दर्शन और साधना मात्र से साधक का अज्ञान मिट जाता है:
मोदजी का पाड़ा, झाबुआ (म.प्र.)
पता / स्थान: मोदजी का पाड़ा, झाबुआ, मध्य प्रदेश 457661।
ऐतिहासिक महत्व: यह मध्य भारत का अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध मातंगी मंदिर है। यहाँ नवरात्रि और मातंगी जयंती पर विशाल उत्सव होता है। स्थानीय मान्यता और साधकों के अनुभव के अनुसार यहाँ देवी की आराधना करने से असाध्य मानसिक रोग, वाणी विकार और पारिवारिक कलह का तुरंत समाधान होता है।
कैसे पहुँचें: निकटतम रेलवे स्टेशन मेघनगर (18 किमी) और दाहोद (35 किमी) है। इंदौर हवाई अड्डा लगभग 145 किमी दूर है।
दर्शन समय: प्रातः 6:00 से 12:00 तथा सायं 4:30 से रात्रि 9:00। मैप पर देखें
पश्चिमी मंदिर समूह, खजुराहो (म.प्र.)
पता / स्थान: पश्चिमी मंदिर समूह परिसर, खजुराहो, जिला छतरपुर, मध्य प्रदेश 471606।
ऐतिहासिक महत्व: पौराणिक काल में महर्षि मातंग ने इसी पावन भूमि पर तपस्या कर भगवान शिव के मातंगेश्वर लिंग की स्थापना की थी। यहीं पास में माँ मातंगी की गुप्त तांत्रिक पीठ है। चंदेल राजाओं ने इस मंदिर को तांत्रिक और योगिक साधना के प्रमुख केंद्र के रूप में संवारा था।
कैसे पहुँचें: खजुराहो हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख शहरों से जुड़े हैं।
दर्शन समय: प्रातः 5:30 से सायं 8:00 तक। मैप पर देखें
मीनाक्षी अम्मन मंदिर, मदुरै (तमिलनाडु)
पता / स्थान: मदुरै, तमिलनाडु 625001।
ऐतिहासिक महत्व: श्री विद्या और दक्षिण भारतीय शाक्त परंपरा में भगवती मीनाक्षी को साक्षात 'राज मातंगी' का अवतार माना जाता है। माँ मीनाक्षी के हाथ में सुशोभित हरा तोता और उनकी मरकत श्याम कांति साक्षात मातंगी स्वरूप की पुष्टि करती है। यहाँ दर्शन करने से साधक को अष्ट सिद्धियां और समस्त ललित कलाओं में सर्वोच्च निपुणता प्राप्त होती है।
कैसे पहुँचें: मदुरै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और मदुरै जंक्शन रेलवे स्टेशन से सुगम मार्ग।
दर्शन समय: प्रातः 5:00 से दोपहर 12:30 तथा सायं 4:00 से रात्रि 9:30। मैप पर देखें
यद्यपि माँ मातंगी परम करुणामयी और वात्सल्यमयी देवी हैं, परंतु उनकी साधना को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इस साधना की शुद्धि मुख्य रूप से आंतरिक होती है:
28+ वर्षों का गहन वैदिक ज्योतिष एवं तांत्रिक महाविद्या साधना अनुभव। AIFAS एवं AICAS स्वर्ण पदक विजेता (Gold Medalist)। माँ मातंगी साधना, वाणी सिद्धि, संगीत व बौद्धिक उन्नति, सूर्य-बुध ग्रह शुद्धि एवं पितृ दोष निवारण के मूर्धन्य विद्वान। अयोध्या धाम से विश्वभर के साधकों को शास्त्रोक्त मार्गदर्शन एवं प्रामाणिक अनुष्ठान सेवाएं।
पंडित जी के बारे में अधिक जानेंउत्तर: हाँ, विद्यार्थियों के लिए माँ मातंगी की सात्विक साधना अत्यंत कल्याणकारी है। इससे एकाग्रता, तीव्र स्मरण शक्ति, परीक्षा के भय से मुक्ति और उत्कृष्ट बौद्धिक क्षमता प्राप्त होती है। विद्यार्थी माँ के एकाक्षरी मंत्र 'ऐं' का नित्य 1 माला जप कर सकते हैं।
उत्तर: यदि किसी जातक को हकलाने, तुतलाने या जनसभा में बोलने में संकोच व घबराहट की समस्या हो, तो अभिमंत्रित मातंगी यंत्र की स्थापना और 24,000 मंत्रों के जप के बाद कंठ पर अभिमंत्रित केसर का तिलक लगाने से वाणी दोष शीघ्र शांत हो जाता है।
उत्तर: संगीत और कला की मूल आत्मा नाद-ब्रह्म है और माँ मातंगी नाद की अधिष्ठात्री हैं। तानसेन और प्राचीन काल के महान संगीत मनीषियों ने मातंगी साधना से ही रागों में प्राण फूंकने की शक्ति प्राप्त की थी। गायकों और वादकों को यह साधना अद्वितीय ऊंचाई देती है।
उत्तर: माँ मातंगी को मीठा पान (तांबूल), अनार के दाने, केले, खीर, मालपुआ और ताजे मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं। पान का भोग माँ को अति प्रिय है और यह वाणी में माधुर्य उत्पन्न करता है।
उत्तर: बिल्कुल। सूर्य ग्रह की शांति हेतु वैदिक जप के साथ-साथ जब माँ मातंगी का अनुष्ठान संपन्न कराया जाता है, तो कुंडली का ग्रहण दोष, पितृ दोष और नीच का सूर्य जातक को कष्ट देने के बजाय शुभ फल और राजकीय सम्मान प्रदान करने लगता है।
संगीत, कला, बौद्धिक सफलता एवं सूर्य ग्रह शांति हेतु आज ही पूज्य आचार्य जी से मार्गदर्शन प्राप्त करें।