कर्मफल प्रदाता न्याय के देवता का शांति विधान
3 चरणों का संपूर्ण ज्योतिषीय विश्लेषण, मानसिक अशांति, व्यापारिक संकट व कष्टों से रक्षा हेतु शास्त्रोक्त समाधान।
।। नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।
आचार्य जी से शनि गोचर जांच व उपाय पाएं"शनिर्भाग्यविधायकश्च शनिः कर्मफलप्रदः। शान्ते शनौ प्रसन्ने च सर्वसौख्यं प्रजायते॥"
— स्कंद पुराण, सौर पुराण एवं पराशर फलित सिद्धांत
नवग्रह मंडल में भगवान सूर्यपुत्र शनि देव को सर्वोच्च न्यायाधीश एवं दंडाधिकारी का पद प्राप्त है। शनि देव कभी किसी के शत्रु या अनिष्टकारी नहीं होते, वे केवल जातक के प्रारब्ध और संचित कर्मों का निष्पक्ष लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। साढ़े सात वर्ष (साढ़े साती) और ढाई वर्ष (ढैय्या) का गोचर वास्तव में आत्मा के शुद्धिकरण की एक अलौकिक भट्ठी है, जिसमें तपकर व्यक्ति का अहंकार, भ्रम और तामसिक विकार भस्म हो जाते हैं। यदि सही समय पर शास्त्रोक्त महामृत्युंजय संपुट जप, दशरथकृत शनि स्तोत्र, छायापात्र दान और सात्विक कर्म किए जाएं, तो यही शनि देव जातक को रंक से राजा बनाकर अचल संपत्ति, अखंड राज्यपद और आत्मिक शांति प्रदान करते हैं।
शनि का दंड कठोर अवश्य होता है, परंतु उनकी कृपा भी अपार होती है। महर्षियों ने साढ़े साती के कष्टों से मुक्ति के लिए वैदिक अनुष्ठानों और सात्विक जीवनचर्या के अचूक नियम प्रतिपादित किए हैं।
पं० राधेश्याम मिश्र (28+ वर्षों का अनुभव) आपकी चंद्र राशि, अष्टकवर्ग बिंदुओं एवं महादशा का अध्ययन कर यह स्पष्ट बताएंगे कि आप साढ़े साती के किस चरण में हैं और आपको कौन से सटीक उपाय अपनाने चाहिए।
चंद्र राशि से शनि के गोचर व ढैय्या की गणना
शनि ग्रह सौरमंडल का सबसे मंद गति से चलने वाला ग्रह है, जो एक राशि को पार करने में पूरे 30 माह (ढाई वर्ष) का समय लेता है। जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस राशि में बैठा होता है, वह जातक की 'जन्म राशि' कहलाती है। जब गोचर का शनि उस राशि के एक घर पहले (12वें भाव) में आता है, तब साढ़े साती आरंभ होती है, और जब वह उस राशि के एक घर आगे (द्वितीय भाव) से निकलता है, तब साढ़े साती समाप्त होती है:
स्थान व अवधि: चंद्र राशि से 12वें भाव में (प्रथम ढाई वर्ष)।
शारीरिक व सूक्ष्म प्रभाव: इसे 'मस्तक पर शनि' कहा जाता है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से जातक की बुद्धि, सोच और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। अनियंत्रित फिजूलखर्ची, व्यापार में अचानक मंदी, आंखों में कष्ट, अनिद्रा, व्यर्थ की यात्राएं और गुप्त शत्रुओं द्वारा षड्यंत्र का सामना करना पड़ता है। जातक का मानसिक संतुलन बार-बार विचलित होता है।
स्थान व अवधि: ठीक चंद्र राशि के ऊपर (मध्य के ढाई वर्ष)।
शारीरिक व सूक्ष्म प्रभाव: इसे 'हृदय पर शनि' कहा जाता है। यह साढ़े साती का सर्वाधिक कठिन और निर्णायक चरण होता है। इसमें शनि देव व्यक्ति के संपूर्ण चरित्र और धैर्य की परीक्षा लेते हैं। शारीरिक रोग, परिजनों से मतभेद, माता-पिता को कष्ट, दांपत्य जीवन में तनाव, नौकरी में भारी संघर्ष और मान-सम्मान पर आंच आती है। व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है।
स्थान व अवधि: चंद्र राशि से द्वितीय भाव में (अंतिम ढाई वर्ष)।
शारीरिक व सूक्ष्म प्रभाव: इसे 'पैरों पर शनि' (उतरती साढ़े साती) कहा जाता है। इसका प्रभाव धन और कुटुंब पर होता है। संपत्ति संबंधी विवाद और वाणी दोष के कारण संबंध बिगड़ सकते हैं। परंतु यह चरण विदाई का समय होता है। यदि जातक ने पूर्व के 5 वर्ष धैर्य और सत्यनिष्ठा से व्यतीत किए हैं, तो उतरता हुआ शनि स्थायी संपत्ति, नया व्यवसाय और मान-प्रतिष्ठा देकर जाता है।
कंटक शनि (चतुर्थ भाव): चंद्र राशि से चौथे भाव में शनि का गोचर गृह सुख में कमी, माता के स्वास्थ्य में कष्ट और कार्यक्षेत्र में भारी अस्थिरता लाता है।
अष्टम शनि (अष्टम भाव): चंद्र राशि से आठवें भाव में शनि का गोचर 'अत्यंत कष्टकारी ढैय्या' माना गया है। यह आकस्मिक दुर्घटना, गुप्त व्याधियों, आर्थिक दिवालियापन और जीवन संकट का समय होता है। इसके लिए महामृत्युंजय जप अनिवार्य है।
जनमानस में यह मिथ्या प्रचार है कि साढ़े साती सदैव विनाश ही करती है। सच्चाई यह है कि यदि कुंडली में वृषभ लग्न (शुक्र), तुला लग्न (शुक्र), मकर लग्न (शनि) अथवा कुंभ लग्न (शनि) हो, तो शनि देव राजयोगकारक होते हैं। यदि शनि केंद्र या त्रिकोण में अपनी उच्च राशि (तुला) में बैठे हों, तो वे पंचमहापुरुष योगों में श्रेष्ठ 'शश योग' बनाते हैं। ऐसे जातकों को साढ़े साती के दौरान ही अप्रत्याशित रूप से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, शीर्ष न्यायाधीश, बहुराष्ट्रीय कंपनी का सीईओ या अरबपति बनने का अवसर प्राप्त होता है।
शनि की तीन विशेष दृष्टियां: शनि देव जहां बैठते हैं, उससे 3रे भाव (पराक्रम), 7वें भाव (विवाह व साझेदारी) और 10वें भाव (कर्म व पद) को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। शनि की दृष्टि विच्छेदात्मक होती है, अतः इन भावों की शांति के लिए नित्य हनुमान आराधना अनिवार्य है।
शनि के प्रकोप और उग्रता को शांत करने के लिए शास्त्रों में केवल सात्विक एवं वैदिक अनुष्ठानों का विधान है। किसी भी प्रकार के तामसिक या काले जादू के चक्कर में न पड़ें। निम्नलिखित वैदिक अनुष्ठान सर्वाधिक प्रामाणिक माने गए हैं:
भगवान शिव शनि देव के गुरु और परम आराध्य हैं। स्कंद पुराण के अनुसार जब शनि देव ने भगवान शिव की घोर तपस्या की, तब शिव जी ने ही उन्हें नवग्रहों में दंडाधिकारी का पद प्रदान किया। जब साढ़े साती या अष्टम ढैय्या में स्वास्थ्य और जीवन पर घोर संकट आ जाए, तो योग्य ब्राह्मणों द्वारा सवा लाख (1,25,000) महामृत्युंजय मंत्र का संपुटित जप एवं दशांश हवन कराया जाता है। यह अनुष्ठान अकाल मृत्यु के योग को टालकर जातक को पूर्ण दीर्घायु प्रदान करता है।
शनि शिंगणापुर (महाराष्ट्र), कोकिलावन धाम (मथुरा) अथवा प्राचीन शनि मंदिरों में विधिवत सरसों अथवा तिल के तेल से शनि विग्रह का अखंड तैलाभिषेक किया जाता है। साथ ही शमी समिधा, काले तिल, जौ, घृत, गुग्गुल और नीलकमल से शनि महामंत्र (23,000 जप) का दशांश हवन करने से शनि देव की वक्र दृष्टि सौम्य और कल्याणकारी दृष्टि में बदल जाती है।
पद्म पुराण में वर्णित 'छायापात्र दान' शनि की पीड़ा को तत्काल हरने वाला अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली उपाय है। इसे शनिवार के दिन सूर्योदय के तुरंत बाद या सूर्यास्त के समय किया जाता है:
दैनिक जीवन में निम्नलिखित सात्विक नियमों और स्तोत्रों का नियमित अनुष्ठान करने से साढ़े साती की कठिनतम अवधि भी बिना किसी गंभीर संकट के सुखपूर्वक व्यतीत हो जाती है:
पद्म पुराण के अनुसार जब शनि देव रोहिणी नक्षत्र भेदन करने वाले थे, तब चक्रवर्ती राजा दशरथ ने इस स्तोत्र से शनि देव को प्रसन्न किया था। शनि देव ने वचन दिया था कि जो भी इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे साढ़े साती में कभी पीड़ा नहीं होगी:
"नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च। नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥ नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च। नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते॥"
शनिवार की शाम को हनुमान मंदिर में चमेली के तेल का सिंदूरी दीपक जलाएं। कम से कम 3 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें अथवा सुंदरकांड का पाठ करें। हनुमान जी की शरण में जाने वाले जातक को शनि देव कभी प्रताड़ित नहीं करते बल्कि उसके सहायक बन जाते हैं।
शमी (खेजड़ी) का वृक्ष साक्षात शनि देव का स्वरूप माना गया है। शनिवार की सायं शमी वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें और सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं। साथ ही काले कुत्ते को सरसों के तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं और चींटियों को काले तिल व शक्कर का आटा डालें।
शनि देव के नाम पर भयभीत होकर अनाप-शनाप पत्थर पहनने या भ्रामक तांत्रिक क्रियाओं से बचने के लिए प्रामाणिक वैदिक मार्गदर्शन आवश्यक है। आचार्य पं० राधेश्याम मिश्र के सानिध्य में आपको मिलता है:
व्हाट्सएप पर अपना नाम, जन्म तारीख, जन्म समय और स्थान भेजें। आचार्य जी आपकी चंद्र राशि और महादशा का गहन अध्ययन कर आपको साढ़े साती के चरण और उसके अचूक सात्विक उपायों से अवगत कराएंगे।
28+ वर्षों का दीर्घ वैदिक ज्योतिष, कर्मकांड एवं ग्रह शांति का अनुभव। AIFAS एवं AICAS से गोल्ड मेडलिस्ट। शनि साढ़े साती, ढैय्या, महामृत्युंजय अनुष्ठान एवं नवग्रह शांति में भारत एवं विदेशों में हजारों लोगों को संकटमुक्त कर चुके हैं। अयोध्या धाम से प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन परामर्श उपलब्ध।
पंडित जी के बारे में अधिक जानेंशनि ग्रह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष (2.5 वर्ष) तक गोचर करता है। जब शनि जन्मकुंडली में जातक की चंद्र राशि से द्वादश (12वें), प्रथम (जन्म राशि) और द्वितीय (दूसरे) भाव में गोचर करता है, तो इन तीनों राशियों में कुल साढ़े सात वर्षों का समय लगता है, जिसे 'शनि की साढ़े साती' कहा जाता है। वहीं जब शनि चंद्र राशि से चतुर्थ अथवा अष्टम भाव में गोचर करता है, तो इसे ढाई वर्ष की 'शनि की ढैय्या' (कंटक शनि अथवा अष्टम शनि) कहा जाता है।
साढ़े साती का द्वितीय चरण (मध्यम चरण), जब शनि ठीक चंद्र राशि के ऊपर से गोचर करता है, सर्वाधिक उग्र और कठिन माना गया है। इसे 'शिखर चरण' कहते हैं। इसमें व्यक्ति को मानसिक अवसाद, छाती व हृदय से जुड़े कष्ट, निकटतम परिजनों से वियोग, आजीविका में अवरोध और मानहानि जैसी कठोर परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि तृतीय चरण (उतरती साढ़े साती) में जातक को धीरे-धीरे राहत मिलने लगती है।
नहीं, शनि देव क्रूर ग्रह नहीं बल्कि न्याय और कर्मफल के अधिष्ठाता हैं। वृषभ और तुला लग्न वालों के लिए शनि परम योगकारक होते हैं, तथा मकर और कुंभ लग्न में स्वगृही होते हैं। यदि कुंडली में शनि उच्च (तुला राशि) का हो या 'शश महापुरुष राजयोग' बना रहा हो, तो साढ़े साती के दौरान जातक को अप्रत्याशित संपत्ति, राजनीतिक सत्ता, उच्च पद और वैश्विक ख्याति प्राप्त होती है।
छायापात्र दान शनि की पीड़ा शांत करने का सबसे अचूक तांत्रिक व वैदिक उपाय है। शनिवार के दिन प्रातःकाल एक कांसे या मिट्टी के पात्र में शुद्ध सरसों का तेल भरें, उसमें एक रुपए का सिक्का डालें और उसमें अपना चेहरा (मुख का प्रतिबिंब) ध्यानपूर्वक देखें। इसके पश्चात उस तेल व सिक्के सहित पात्र को किसी शनि मंदिर में अथवा शनि दान मांगने वाले डाकौत को दान कर दें। इससे जातक के ऊपर आने वाली विपत्तियां छाया के साथ दान हो जाती हैं।
बिना योग्य ज्योतिषी की सलाह के कभी भी नीलम (Blue Sapphire) नहीं पहनना चाहिए। नीलम एक अत्यंत तीव्र और चमत्कारी रत्न है जो 24 घंटे में अपना शुभ या अशुभ फल दिखा देता है। यदि कुंडली में शनि मारक भाव (6, 8, 12 या मेष नीच राशि) का स्वामी हो, तो नीलम पहनने से भयंकर दुर्घटना, रक्त विकार या दिवालियापन आ सकता है। साढ़े साती में रत्न के बजाय महामृत्युंजय जप और दशरथकृत शनि स्तोत्र सबसे सुरक्षित उपाय हैं।
रामायण और पौराणिक कथाओं के अनुसार लंका दहन के समय पवनपुत्र हनुमान जी ने रावण के बंधन से शनि देव को मुक्त कराया था। तब शनि देव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि 'जो कोई भी भक्त हनुमान जी की नित्य आराधना, हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करेगा, मैं कभी भी उस पर अपनी वक्र दृष्टि नहीं डालूंगा।' अतः साढ़े साती में हनुमान जी की सेवा सर्वोपरि सुरक्षा कवच है।
साढ़े साती और ढैय्या के संकटों से अपनी नौकरी, व्यापार और स्वास्थ्य को बचाएं। आज ही आचार्य जी से परामर्श लें।
हमारा समाधान पूर्णतः वेदोक्त मंत्र, महामृत्युंजय साधना एवं पौराणिक कर्मकांड पर आधारित है।